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वो कहानियाँ पढ़ती है!

मैं घंटों उसे पढ़ते हुए देख सकता हूँ
वो कहानियाँ पढ़ती है,
मैं उसे पढ़ सकता हूँ!

उन पन्नों के किरदार उसके चेहरे पर अक्सर आते- जाते हैं
होठों को दांतों में दबाए जब वो उँगलियों से बालों के छल्ले बनाती है
तो शायद वो भी उनमें कहीं उलझ जाते हैं

ऐसे में गर तेज़ आवाज़ में पुकार लो उसे
तो घबराकर यूँ देखती है जैसे ज़ोर से गिरी हो आसमां से कहीँ
फिर अपनी ही नादानियों पर शर्माके मुस्कुराती है
मैं इस मुस्कुराहट के लिए उसे अनगिनती बार पुकार सकता हूँ,

वो कहानियाँ पढ़ती है,
मैं उसे पढ़ सकता हूँ!!

अपर्णा त्रिपाठी

रात!

ये रात काली
सर्द हवा,
महकती रातरानी
अलाव की आंच
गेसू खुले से
शॉल में लिपटा, सिमटा सा बदन
और तुम्हारी बात!!

चाँद के रात काटने को और क्या चाहिए!

– अपर्णा त्रिपाठी

तुम चले तो गए पर…

तुम्हारे बाद देर तक तुम्हारी परछाइयाँ खेलती रहीं मुझसे,
तुम्हारे बदन की आंच में तपकर सिंदूरी हुए मेरे चेहरे को चूमती रहीं,
लबों से रख दिए होठों पे कई वादे,
उनकी आग़ोश में दम तोड़ते रहे अनगिनत ख़ामोश सवाल
ख़यालात के शोर में भी धड़कनों का संगीत साफ़ सुनाई देता रहा,
मैं, यहां रहकर भी थोड़ा सा कहीं ग़ुम हो गई

तुम चले तो गए, पर थोड़ा सा यहीं रह गए!

अपर्णा त्रिपाठी©

सत्य

गंगा के इस पार
मैं,
एक पत्थर पर बैठी
पानी में पैर डाले
अठखेलियां करती नदी से खेलती

उस पार,
आसमान को धूमिल करता
स्याह धुआं,
चिता को राख करती अग्नि से धू- धूकर उठता

वो सत्य है- अंतिम
सत्य ये भी- एक पल

इस सत्य से उस सत्य के बीच कल- कल करती बहती है जिजीविषा।

अपर्णा त्रिपाठी ©

रंगमंच

आप सभी को “विश्व रंगमंच दिवस” की हार्दिक बधाई।

जब हम रंगमंच का हिस्सा थे ना,
रोज़ सुबह,
अपनी ही शक्ल, अपना किरदार लिए थिएटर चले आते
वहीं हँसते, रिहर्सल करते,
जो मन में आए बोलते, बतियातेे,
अक्सर तो थक कर वहीं सो भी जाते

जब मंचन होता
तब
चेहरे पर मेकअप लगा कर,
किसी और शख़्स का नक़ाब ओढ़ कर
स्क्रिप्ट की लाइनें यूँ बोल जाते
मानों हम ही वो शख़्स हैं, वो किरदार हैं
यही मंच सच है और ये खेल ही एकमात्र सच्चाई

अब हम बड़े हो गए हैं
स्टेज से परे हो गए हैं

अब,
रोज़ सुबह उठकर
अपनी शक्ल पर किसी और का नक़ाब चढ़ाते हैं
किसी और का किरदार ओढ़कर ज़िंदगी खेलने जाते हैं
इस बार ख़ुद ही निर्देशक हैं,
संवाद ख़ुद ही बोल जाते हैं,
अंत सोचो भी तो पात्र बदल जाते हैं

पर हमें अब भी लगता है,
यही मंच सच है और ये खेल ही एकमात्र सच्चाई

अपर्णा त्रिपाठी ©

ख़्वाब

मेरे एक दोस्त ने अचानक आज फ़ोन किया
बीती रात उसने मुझे सपने में देखा था

टहल रहे थे कहीं किसी छत पे हम दोनों
अपनी ही तरह की बातों में मशगूल
मेरी तबीयत ज़रा नासाज़ थी
बदलते मौसम का असर, या यूं ही कुछ शायद
परेशां हो गया था वो

इसी ख़्वाब में दिन भर उलझा रहा
पहली फुरसत में तसल्ली कर रहा था
हंसी थी ज़ोर से पहले मैं
उसकी बातों पर
फिर
कलेजा भर सा आया था,
चलो कुछ तो कमाया है!

जानां,
क्या मैं, तुम्हारे ख़्वाब में नहीं आती?

अपर्णा त्रिपाठी©

पलाश

कभी देखा है पलाश के पेड़ को…

पतझड़ आते ही झड़ जाते हैं इसके सारे पत्ते
एक हरी फुनगी नहीं दिखती
एकदम नीरव, उजाड़…
और फिर
एक फूल खिलता है लाल सा
फूलों के बोझ से दबी डालियाँ दहक उठती हैं जंगल की आग से लाल फूलों से

सुनो ना,
अब तो पतझड़ को बीते एक अरसा हुआ
मिलो ना मुझसे यूँ की मुझे पलाश कर दो

अपर्णा त्रिपाठी©

साप्ताहिक क्रांति

इस मायूस ठण्ड में भी मेरे कलम की स्याही जम गई है
अलसा के सारे जज़्बात रजाई में जा छुपे हैं

झकझोरती नहीं है स्कूल में एक बच्चे की हत्या
अस्पताल में मरीज़ की मौत के बाद लाखों का बिल
ख़ून नहीं खौलाती देशभक्ति के नाम पर धार्मिक उन्माद की खबरें
बलात्कार, बेरोज़गारी, किसानों की आत्महत्या
लोगों के नसों में दौड़ते खून को भयावह ख़बरों ने जमा दिया है

ना जाने और कितनी “साप्ताहिक क्रांतियाँ ” चाहिए
फिर से उबाल लाने के लिए

अपर्णा त्रिपाठी©